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रविवार, 29 सितंबर 2013

धूम्रपान की लत [Smoking Addiction]

तंबाकू और धूम्रपान की लत ने कब हमारे जीवन में जगह बना ली, पता तक नहीं चल पाता। कभी दूसरे को देखकर, तो कभी बुरी संगत में आकर लोग सिगरेट, गुटखा, तंबाकू व दूसरी नशीली चीजों को साथी बना लेते हैं। इन्हें लेने वालों को लगता है कि इन चीजों ने उनकी जिंदगी आसान बना दी है। कई बार कम उम्र में ही खुद को बड़ों जैसा महसूस करने की ख्वाहिश में धुएं के छल्ले उड़ाने की ललक भी इस दलदल में धकेल देती है। जब इससे परेशानी होने लगती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। हर कश स्वस्थ जीवन पर जुल्म ढाता है। हर पुड़िया में जिंदगी घुल रही है। तंबाकू की हर चुटकी जिंदगी को चाट रही है। 
तंबाकू में नुकसानदायक केमिकल
तंबाकू में चार हजार से ज्यादा नुकसानदायक केमिकल पाए जाते हैं। सिगरेट में 40 ऐसे रसायन हैं, जो कैंसर की वजह बनते हैं। इनमें प्रमुख हैं:
निकोटिन: यह लत लगाने वाला केमिकल है। काफी शक्तिशाली है और तेजी से रिऐक्शन करता है। सिगरेट की लत इसी की वजह से लगती है।

बेंजीन: इसमें कोयला और पेट्रोलियम जैसे ज्वलनशील पदार्थों का गुण होता है। यह सिगरेट के जले रहने में मदद करता है। इसकी वजह से ल्यूकेमिया हो सकता है।

फॉर्मल्डिहाइड: काफी जहरीला होता है। इसका इस्तेमाल शवों को सुरक्षित रखने में किया जाता है। इसकी वजह से कैंसर होने का खतरा रहता है।

अमोनिया: टॉयलेट क्लीनर और ड्रायक्लिनिंग लिक्विड में इस्तेमाल किया जाता है। यह तंबाकू से निकोटिन को अलग कर गैस में बदल देता है।

एसिटोन: इसका इस्तेमाल नेल पॉलिश हटाने में होता है। इसमें ज्वलनशील गुण होता है जो फेफड़ों को काफी नुकसान पहुंचाता है।

टार: स्मोकिंग के समय धुएं के रूप में यह फेफड़े में जमा होता है। स्मोकिंग के दौरान जितनी टार बनती है, उसका 70 फीसदी फेफड़ों में जमा होता है। आर्सेनिक (चूहे मारने का जहर), हाइड्रोजन साइनाइड जैसे काफी जहरीले रसायन भी होते हैं।

धूम्रपान से खतरे:
-एक सिगरेट में 9 मिग्रा निकोटीन होता है, जो जलकर 1 ग्राम रह जाता
है। निकोटीन सीधा शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता लेकिन यह सैकड़ों केमिकल के साथ रिएक्शन कर टार बनाता है। यह टार फेफड़ों के ऊपर परत के रूप में चढ़ जाता है और बाद में उन्हें खत्म करने लगता है। अलग-अलग सिगरेट में निकोटीन का स्तर अलग-अलग होता है। सूखे हुए एक ग्राम तंबाकू में निकोटीन का स्तर 13.7 से 23.2 मिलीग्राम तक होता है।
* फेफड़ों का कैंसर : सबसे अधिक असर मनुष्य के फेफड़ों पर पड़ता है। 90 प्रतिशत फेफड़ों का कैंसर पुरुषों में और 80 प्रतिशत महिलाओं में होता है।

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मुँह का कैंसर : भारत वर्ष में कैंसर के मरीजों की कुल संख्या में 40 प्रतिशत मरीज मुँह के कैंसर से पीड़ित हैं जिसका एकमात्र कारण धूम्रपान एवं तंबाकू का सेवन है। मुँह का कैंसर अगर प्रारंभिक अवस्था में पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है।

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बर्जर डीसीज : अधिक धूम्रपान से पाँव की नसों में बीमारी पैदा हो जाती है। कभी-कभी तो पाँव भी काटना पड़ जाता है।

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हृदय रोग : स्ट्रोक व हार्ट अटैक की अधिक संभावना रहती है। धूम्रपान से उच्च रक्तचाप व कार्डियोवेस्कूलर बीमारियाँ अधिक होती हैं।

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मोतियाबिंद : धूम्रपान करने वालों में मोतियाबिंद होने की 40 प्रतिशत अधिक संभावना रहती है।

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बहरापन : धूम्रपान करने वाले की सुनने की शक्ति कम हो जाती है। बहरेपन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

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पेट की बीमारी : पेट में छाले हो जाते हैं, स्मोकर्स अल्सर का इलाज कठिन है एवं ये छाले बार-बार होते हैं।

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हड्डियों के रोग : आस्टियोपोरोसिस होता है, हड्डी की डेन्सिटी कम हो जाती है। फ्रेक्चर होने की स्थिति में हड्डी जुड़ने में 80 प्रतिशत अधिक समय लगता है।

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चेहरे पर झुर्रियाँ : धूम्रपान करने वाले की चेहरे की चमड़ी समय से पूर्व बूढ़ी हो जाती है क्योंकि चमड़ी का लचीलापन कम हो जाता है व आदमी उम्र से पहले बूढ़ा होने लगता है।

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मुँह के अन्य रो :अगर आप लम्बें समय से धुम्रपान कर रहे है तो अब आप अपने दांतों और मसूड़ो की ठीक से देख-रेख शुरू कर दिजिए। दरअसल धूम्रपान करने से दांत पीले होने के साथ-साथ मुंह से बास और मसूड़ों के खराब होने संबंधी बीमारियां पैदा होती है। एक सोध के अनुसार धुम्रपान ना करने वालों के मुकाबले धुम्रपान करने वालों के दांत ज्यादा कमजोर होते है और उनके टूटने की संभावना भी काफी अधिक होती है, साथ ही मसूड़ों में जलन और सूजन संबंधी दिक्कतें भी पैदा होती है।


निकोटिन की लत के लक्षण :
अगर नीचे दिए गए लक्षण नजर आने लगें तो समझ लेना चाहिए कि इंसान को निकोटिन की लत लग चुकी है।

-भूख कम महसूस होना।

-अधिक लार और कफ बनना।

-प्रति मिनट दिल की धड़कन 10 से 20 बार बढ़ जाती है तो यह लत का लक्षण है।

-छोटी बात पर भी बेचैनी महसूस होना।

-ज्यादा पसीना आना और उल्टी-दस्त होना।

-हर काम करने के लिए तंबाकू की जरूरत महसूस होना।

-निकोटीन लेने की इच्छा बढ़ जाना।

-चिंता बढ़ना, अवसाद, निराशा आदि महसूस होना।

-सिर दर्द होना और ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होने लगे तो भी इसे निकोटिन की लत का लक्षण माना जाता है।

कैसे बनते हैं चेन स्मोकर
जब कोई सिगरेट या बीड़ी पीता है तो ब्रेन में लगभग 10 सेकंड और उसके बाद सेंट्रल नर्वस सिस्टम में 5 मिनट तक निकोटिन का असर रहता है। हालांकि स्मोकिंग करने से थोड़ी देर के लिए काम करने की क्षमता बढ़ती है, लेकिन बाद में शरीर सुस्त होने लगता है। धीरे-धीरे काम करने की क्षमता कम होती जाती है और फिर धूम्रपान की जरूरत महसूस होती है। बार-बार इस तलब को मिटाने की कोशिश में इंसान चेन स्मोकर हो जाता है।

निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरपी :
निकोटिन ही वह केमिकल है, जो बार-बार स्मोकिंग करने को मजबूर करता है। इससे मुक्ति पाने के लिए निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरपी दी जाती है। इसमें निकोटिन लॉजेंज (Nicotine Lozenges), ट्रांसडर्मल निकोटिन (Transdermal Nicotine), निकोटिन इनहेलर (Nicotine Inhaler), निकोटिन नेजल स्प्रे (Nicotine Nasal spray), निकोटिन गम्स (Nicotine Gums) का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा, निकोरेट-200 या 400 लिया जा सकता है। यह च्यूइंग-गम है। इन दवाओं को डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए। एक्सपर्ट के मुताबिक इन तमाम दवाओं को तब-तब लेने की सलाह दी जाती है, जब-जब सिगरेट की बहुत ज्यादा तलब महसूस हो। धीरे-धीरे इसे कम किया जाता है। बाद में स्मोकिंग की लत छूट जाती है। जो कभी-कभार शौकिया स्मोकिंग करते हैं, उन्हें इन दवाओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

होमियोपैथी :
होमियोपैथी  में ये दवाएं दी जाती हैं, लेकिन इन्हें किसी विशेषज्ञ से पूछकर ही लेना चाहिए। डॉक्टर लक्षण और स्थिति के आधार पर ही दवा और डोज तय करते हैं।

-प्लैंटेगो मेजर (Plantago Major) निकोटिन की वजह से होने वाली सुस्ती और अनिदा से राहत दिलाती है।

-डैफ्ने इंडिका (Daphne Indica) तंबाकू और उससे बनी चीजों की इच्छा खत्म कर देती है।

-कैलेडियम सेग्विनम (Caladium Seguinum) तंबाकू लेने की इच्छा को खत्म कर देती है।

-टबैकम (Tabacum) तंबाकू लेने वाले को उस स्थिति में ला देती है कि तंबाकू लेने की इच्छा होने से उबकाई आने लगती है।

-इपिकॉक (Ipecac) ज्यादा उबकाई और उलटी होने पर फायदा करती है।

-आर्सेनिक अल्बम (Arsenic Album) तंबाकू चबाने के बुरे प्रभावों से राहत दिलाती है।

-नक्स वोमिका (Nux vomica) स्मोकिंग के बाद गैस्ट्रिक की स्थिति में राहत दिलाती है।

-फॉस्फोरस (Phosphorus) धड़कन बढ़ने और यौन शक्ति कमजोर पड़ने पर काम करती है।

आयुर्वेदिक दवाएं :
तंबाकू से संबंधित नशे से मुक्ति पाने के लिए नीचे लिखी आयुर्वेदिक दवाओं का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इन दवाओं का इस्तेमाल करने से धूम्रपान करने वालों को काफी फायदा मिलता है।

-2 ग्राम फिटकरी का फूला, 3 ग्राम गोदंती भस्म और 15 पत्ते सत्व सत्यानाशी का मिश्रण बनाकर पाने के पत्ते में डालकर चबाएं।

-मुलहठी और शरपुंखा सत्व का मिश्रण कत्थे की तरह पान पर लगाकर 15 दिन तक रोज सुबह नाश्ते के बाद लें।

-4 ग्राम आमली चूर्ण, 10 ग्राम भुनी हुई सौंफ, 4 ग्राम इलायची के बीज, 4 ग्राम लौंग, 2 ग्राम मधुयष्ठी, 1 ग्राम सोनामाखी भस्म, 10 ग्राम सूखा आंवला, 7-8 खजूर और 20 मुनक्का मिलाकर पीस लें। एक पैकेट में अपने साथ रखें। जब नशे की तलब महसूस हो तो एक चुटकी मुंह में डाल लें। धीरे-धीरे नशे से मन हट जाएगा।
-बड़ी सौफ को घी में भुनकर चबाने से सिगरेट से नफरत होने लगती है। 
- ऐरोबिक से भी सिगरेट की तलब कम होती है।
- मुंह में गाजर, लौंग, इलायची, चिंगम जैसी वस्तु मुंह में रखें। इससे सिगरेट की तलब कम होती है।


वैकल्पिक तरीके:
ई-सिगरेट (इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट)
ई-सिगरेट के मामलों से जुड़े विशेषज्ञ अंकित गौड़ का कहना है कि इससे शत-प्रतिशत निकोटिन के जीरो लेवल तक पहुंच जाने का दावा तो नहीं किया जा सकता, लेकिन सिगरेट छोड़ने में इससे मदद जरूर मिलती है। इसमें कार्टेज में अलग-अलग स्तर में निकोटिन डाला जाता है। एक अध्ययन से पता चलता है कि जब कोई सिगरेट की 15 कश लेता है तो उसके अंदर 1 से 2 मिलीग्राम निकोटिन जमा होता है, जबकि ई-सिगरेट में 16 मिलीग्राम निकोटिन वाले कार्टेज का इस्तेमाल करने से इतनी ही कश लेने पर 0.15 मिलीग्राम निकोटिन जमा होता है। स्वास्थ के लिहाज से यह तरीका भी सही नहीं है क्योंकि इसके जरिए भी निकोटिन तो शरीर में जाता ही है। इसकी मदद से निकोटिन के स्तर को कम किया जा सकता है और धीरे-धीरे कोई स्मोकर निकोटिन के जीरो लेवल तक पहुंच सकता है। पान की दुकानों पर, दवा की दुकानों पर और इंटरनेट के जरिए इसे खरीदा जा सकता है। पूरी किट 1 से 2 हजार तक मिल जाती है। इससे इतनी कीमत में लगभग 500 सिगरेट पी जा सकती हैं।

हर्बल सिगरेट:
धूम्रपान छोड़ने के लिए हर्बल सिगरेट की भी मदद ली जा सकती है। आयुर्वेदिक दवाएं बनाने वाली कंपनियां हर्बल सिगरेट बना रही हैं। इनमें पुदीना, वाइल्ड लेटिस (सलाद पत्ता), कैट्रिनप (एक प्रकार की सुगंधित वनस्पति), कमल के पत्ते, मकई के रेशे, मुलेठी की जड़ें आदि के सूखे चूर्ण का इस्तेमाल होता है। जब धूम्रपान की तलब महसूस हो तो इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें भी धुआं फेफड़े में जाता है, इसलिए पूरी तरह से इसे भी ठीक नहीं माना जा सकता। शौकिया तौर पर कभी इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पांच से दस रुपये में आयुर्वेदिक दवाओं की दुकान पर मिल जाती है।

मुद्रा, ध्यान और योगाभ्यास:
किसी प्रकार की लत होने से व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है। सिगरेट, तंबाकू, गुटखा, पान मसाला जैसे नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले भी अगर मुद्रा, ध्यान और योगाभ्यास करते हैं तो उनका आत्मबल बढ़ता है। ऐसे में इन लतों को त्याग पाने की इच्छा शक्ति उनके अंदर पैदा होती है।

ज्ञान मुद्रा
दाहिने हाथ के अंगूठे को तर्जनी के टिप पर लगाएं और बायीं हथेली को छाती के ऊपर रखें। सांस सामान्य रहेगा। सुखासन या पद्मासन में बैठकर भी इस क्रिया को किया जा सकता है। लगातार 45 मिनट तक करने से काफी फायदा मिलता है।

ध्यान
ध्यान करने से शरीर के अंदर से खराब तत्व बाहर निकल जाते हैं। एकाग्रता लाने के लिए त्राटक किया जाता है। इसमें बिना पलक झपकाए प्रकाश की लौ को लगातार देखने का अभ्यास किया जाता है। एक समय ऐसा आता है जब बस बिंदु दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में कुछ समय तक रहने की कोशिश करनी चाहिए।

कुछ क्रियाएं
कुंजल क्रिया: नमक मिला गुनगुना पानी भरपेट पीकर इसकी उल्टी कर दें। इससे पेट के ऊपरी हिस्से का शुद्धिकरण हो जाता है।

बस्ती: इस क्रिया के माध्यम से शरीर के निचले हिस्से की सफाई की जाती है। इसे एनीमा भी कहते हैं।

अर्द्ध शंख प्रक्षालन: यह बड़ी आंत की सफाई और कब्ज मिटाने के लिए किया जाता है। इसमें चार लीटर गुनगुने पानी में स्वाद के मुताबिक नमक मिला लें। पानी को पांच भागों में बांटकर बारी-बारी से पीएं और क्रमश: कागासन, ताड़ासन, कटिचक्रासन, त्रियक, भुजंगासन, स्कंधासन नौ-नौ बार करें। क्रियाएं तब तक करें जब तक मल विसर्जन की जरूरत महसूस न हो। मल त्याग तब तक करें, जब तक उसकी जगह पानी न आने लगे। क्रिया के बाद ठंडे पानी का सेवन न करें। ठंडी हवा से बचें। मूंग दाल, चावल की खिचड़ी, शुद्ध घी में मिलाकर खाएं। खाते वक्त पानी न पीएं। कुंजल, बस्ती और अर्द्ध शंख प्रक्षालन हफ्ते में दो बार करने की सलाह दी जाती है। इन क्रियाओं को किसी योग प्रशिक्षक की देख-रेख में ही करना चाहिए।

खानपान:
नेचरल फूड खासकर फल और सब्जियों में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो धूम्रपान करने वाले के स्वास्थ्य को ज्यादा नुकसान होने से रोकते हैं। दूसरी तरफ, ये फल और सब्जियां स्मोकिंग छुड़ाने में भी मददगार होती हैं। इनमें विटामिन सी, विटामिन ए, जिंक और सेलेनियम पाए जाते हैं। नीचे दी गई चीजें खानपान में शामिल करनी चाहिए:

इन्हें लें:
-संतरा, नीबू, अंगूर, केले, सेव, अनानास, नाशपाती, पपीता, आम, अनार, नारियल।

-फूलगोभी, पत्तागोभी, मूली, पालक, गाजर, लहसुन, बेरी, मटर, स्ट्रॉबेरी, अंजीर, बीन, आलू, सोयाबीन, टमाटर, धनिया।

इनसे बचें:
उच्च वसा वाला खान: मीट, मक्खन, दूध व दूसरे डेरी प्रॉडक्ट। पहले का पका हुआ या पैकेटबंद भोजन जिसमें काफी मात्रा में फैट होता है।

कैफीन: कैफीन और दूसरे उत्तेजक पदार्थों का इस्तेमाल कम कर देना चाहिए। ये चीजें स्मोकिंग छोड़ने वालों में एंजाइटी बढ़ाती हैं।

इन पर भी ध्यान दें:
-धूम्रपान बंद करने और गुटखा चबाना छोड़ने के लिए पहले उसकी मात्रा कम करें।
-मन मे ठोस निश्‍चय करके कोई एक दिन निश्‍चित कर लें कि फलां दिन से वीडी सिग्रेट नही पिऐगें।

-सभी मित्रों और परिजनों से कहें कि आपने सिगरेट और गुटखा छोड़ दिया है। ऐसा करने से आपका दोस्त इसे लेने के लिए बाध्य नहीं करेगा।

-इन लतों को छोड़ने की वजहों को दिन में दो-चार बार दुहराएं।

-उत्प्रेरक के रूप में काम करने वाली आदतों को छोड़ें मसलन चाय, शराब, कॉफी लेने या भोजन के बाद सिगरेट या गुटखे की तलब।

-अपने पास लाइटर, माचिस, गुटखे की पुड़िया, तंबाकू रखना छोड़ दें।

-तनाव की स्थिति में घर या ऑफिस से बाहर टहलने न निकलें।

-सिगरेट या गुटखे की तलब हो तो कुछ पसंदीदा चीजें चबाएं।

-मेटाबॉलिज्म बढ़ाने के लिए दिन भर में पांच बार खाएं लेकिन थोड़ा-थोड़ा खाएं।

-अपने भोजन में नमक का ज्यादा इस्तेमाल न करें।

-क्षमता के मुताबिक रोजाना व्यायाम करें।
उपरोक्त बातो को अपने जीवन मे अपना कर आप सिग्रेट रुपी मीठे जहर से बच सकते हैं।
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स्मोकिंग इफेक्ट से बचाए 'स्मोकर्स डाइट'

स्मोकर्स डाइट स्मोकिंग से होने वाले साइड इफेक्ट्स को काफी हद तक कम कर देती है। अगर आप स्मोकिंग पर कंट्रोल नहीं कर पा रहे हें, तो हेल्दी रहने के लिए आपको स्मोकर्स डाइट को लेना बेहद जरूरी है:

अगर आपको स्मोकिंग की लत पड़ चुकी है, तो आपको होने वाली प्रॉब्लम्स से बचने के लिए आपको उसे छोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। बेशक, आप ऐसा बखूबी कर सकते हैं, जरूरत है बस मेंटली प्रिपेयर होने। हो सकता है कि इसमें थोड़ा समय लग जाए, लेकिन आपको इसे लेकर परेशान नहीं होना चाहिए। दरअसल, तब आप स्मोकर्स डाइट लेकर सिगरेट के साइड इफेक्ट्स से जो बच सकते हैं।

एक्सपर्ट डॉ. विजय शुक्ला बताते हैं, 'स्मोकिंग करने से कैंसर, हार्ट डिसीज, स्ट्रोक, कोल्ड और कफ जैसी प्रॉब्लम्स हो जाती हैं। आमतौर पर ये दिक्कतें स्मोकिंग ज्यादा करने और न्यूट्रिशंस फूड कम खाने से होती हैं। स्मोकिंग के बाद बॉडी में विटामिन सी, ई, जिंक, कैल्शियम, फ्लोट और ओमेगा- थ्री की कमी हो जाती है। अगर वे खाने के जरिए इन चीजों को ले लेते हैं, तो बॉडी डैमेज होने के चांस कम हो जाते हैं।'

विटामिन सी
स्मोकिंग करने वाले इंसान के लिए विटामिन सी बेहद जरूरी है। इसलिए दिनभर में एक खट्टा फल जरूर खाएं। ऑरेंज, वॉटर मेलन और टोमैटो ये सभी विटामिन सी से भरपूर होते हैं। ये आप पर अटैक कर रही कई बीमारियों से लड़ने में आपकी मदद करते हैं। दरअसल, बॉडी में विटामिन सी की कमी होने से स्मोकिंग का बेहद नेगेटिव असर पड़ता है। इससे इम्यून सिस्टम वीक हो जाता है। रिसचर्स के मुताबिक, रोजाना 1000 मिलीग्राम विटामिन ई लेने से स्मोकिंग का रिस्क फैक्टर 45 फीसदी कम हो जाता है। यही नहीं, विटामिन सी स्मोकर्स में होने वाली कॉमन गम प्रॉब्लम से भी आपको बचाए रखता है।

ग्रीन टी
स्टडीज से पता चला है कि अगर आप रोजाना छह से सात कप ग्रीन टी पीते हैं, तो आपको स्मोकिंग से होने वाले साइड इफेक्ट्स 40 से 50 फीसदी कम हो जाते हैं। ग्रीन टी में एंटी ऑक्सिडेंट होते हैं, जो बॉडी को डिटॉक्स करने में मदद करते हैं। स्मोकिंग करने से बैड ब्रीथ की प्रॉब्लम हो जाती है। ऐसे में ब्रीथ को फ्रेश रखने में भी ग्रीन टी बेहद काम आती है। यही नहीं, ग्रीन टी कैंसर के रिस्क को भी कम करती है। यह इम्यून सिस्टम को भी ठीक रखती है, जिससे आप स्किन की प्रॉब्लम से भी बचे रहते हैं।

ग्रीन वेजीटेबिल
ग्रीन वेजीटेबिल्स में करोटिनॉयड्स नाम का एक खास तत्व होता है। हरी सब्जियों में मौजूद ये तत्व स्मोकर्स केलिए खास फायदेमंद है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्रीन वेजीटेबिल्स खाने से कैंसर का रिस्क 20 फीसदी कम होजाता है। इसलिए पालक और ब्रोकली जैसी सब्जियों को अपनी डाइट में जरूर शामिल करें।

केप्सिकम
केप्सिकम्स एंटी ऑक्सिडेंट्स से भरपूर होते हैं। स्मोकिंग करने वालों की डाइट में इनका होना बेहद फायदेमंदहोता है। जहां तक हो सके, केप्सिकम्स को कच्चा खाने की कोशिश करें। इन्हें अधिक फ्राई व पकाएं नहीं।

लहसुन
सलाद, शोरबे व करी में लहसुन मिलाएं। अगर आपको इसकी स्मैल पसंद नहीं है, तो लहसुन की फांक कच्ची हीखा लें। लहसुन में ट्यूमर से लड़ने की ताकत होती है, जो स्मोकर्स के लिए जरूरी है। दरअसल, सिगरेट बॉडी मेंकार्सिनोमा नाम का जहरीला तत्व बनाता है, जिससे ट्यूमर बनता है। ऐसे में, लहसुन उससे लड़ता है।

विटामिन ई
स्मोकिंग करने से हार्ट अटैक होने के चांस बढ़ जाते हैं। दरअसल, स्मोकिंग बैड कॉलेस्ट्रॉल को बढ़ाती है। तबविटामिन ई इस कॉलेस्टॉल को हार्मफुल होने से रोकता है। विटामिन ई सनफ्लॉवर सीड्स, ऑलमंड, ऑलिव्सऔर ग्रीन पत्तियों में बहुत क्वांटिटी में होता है।

ओमेगा थ्री एसिड्स
अगर आप रोजाना ओमेगा थ्री फैटी एसिड्स लेते हैं, तो आप स्मोकिंग के साइड इफेक्ट्स से काफी हद तक बचसकते हैं। ओमेगा थ्री में पाया जाने वाला पॉलिसैचुरिएट फैटी एसिड लंग्स के साथ दांतों व जबड़ों को भी ठीकबनाए रखता है।

पिएं खूब पानी
पानी ही एक ऐसी चीज है, जो आपकी बॉडी से निकोटिन और दूसरे केमिकल्स को बाहर करने में मदद करती है।इसलिए खूब सारा पानी पिएं। यही नहीं, पानी स्मोकिंग के मुंह में होने वाले इफेक्ट्स को भी काफी कम कर देताहै।

फिल्टर सिगरेट
अगर आप दिनभर में तीन से ज्यादा सिगरेट लेते हैं, तो फिल्टर सिगरेट यूज करें। फिल्टर लगा होने से आपकेलंग्स में निकोटिन की क्वांटिटी बेहद कम पहुंचती है। हालांकि यह नॉर्मल सिगरेट से थोड़ी महंगी होती है, लेकिनआपके रिस्क फैक्टर को काफी कम कर देती है।

महिलाएं लें हेल्दी फूड
जो महिलाएं स्मोकिंग करती हैं, उनके लिए हेल्दी फूड लेना बेहद जरूरी है। दरअसल, स्मोकिंग आपके बोंस परभी सीधे इफेक्ट डालती है। इसके सेवन से ऑस्टियोपोरेसिस, बोन में वीकनेस आना जैसी प्रॉब्लम्स आ जाती हैं।अगर आप हेल्दी डाइट लेती हैं, तो स्मोकिंग के इफेक्ट को कम कर सकती हैं। हेल्दी बोंस के लिए कैल्शियम,मैग्निशियम और विटामिन डी की भरपूर क्वांटिटी लेना जरूरी है।

इन्हें रखें याद
- रोजाना 20 से अधिक सिगरेट पीने वालों को हार्ट अटैक के चांस 5 गुना, 10 से 19 सिगरेट पीने से 3 गुना और5 से कम सिगरेट पीने से यह जोखिम 1.5 गुना बढ़ जाता है।
-एक सिगरेट जिंदगी के 11 मिनट कम कर देती है और सिगरेट के धुएं से हार्ट अटैक्स का खतरा 90 फीसदी बढ़जाता है।
- देश में स्मोकिंग करने वाली महिलाओं का औसत 1.5 फीसदी है।
-कॉल सेंटरों और टीवी चैनल में काम करने वाली तकरीबन 8 फीसदी महिलाएं सिगरेट की लत की शिकार हैं.
इन योगासनों से मिलती  है धूम्रपान से निजात:
योगासन: सर्वागासन (शोल्डर स्टैंड), सेतु बंधासन (ब्रिज मुद्रा), भुजंगासन (कोबरा पोज), शिशुआसन (बाल पोज)।
प्राणायाम: सहज प्राणायाम, भसीदा प्राणायाम, नाड़ी शोधन प्राणायाम (नोस्ट्रिल ब्रीदिंग तकनीक)।

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

"अस्थमा के बारे में सम्पूर्ण जानकारी"( Complete information about asthma)


अस्थमा(दमा) से आप सब परिचित ही होंगे,आजकल बदलते वातावरणीय प्रदूषण, खान-पान में मिलावट व शुद्धता में कमी के चलते अस्थमा जिसे आमभाषा में दमा भी कहते हैं, के मरीजों की संख्या में वृध्दि के मामले निरंतर प्रकाश में आ रहे हैं।जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने मे परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं।अस्थमा (Asthma) एक गंभीर बीमारी है, जो श्वास नलिकाओं को प्रभावित करती है। श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर-बाहर करती हैं। अस्थमा होने पर इन नलिकाओं की भीतरी दीवार में सूजन होता है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी बेचैन करनेवाली चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और उस स्थिति में फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है। इससे खांसी, नाक बजना, छाती का कड़ा होना, रात और सुबह में सांस लेने में तकलीफ आदि जैसे लक्षण पैदा होते हैं।अस्थमा एक अथवा एक से अधिक पदार्थों (एलर्जेन) के प्रति शारीरिक प्रणाली की अस्वीकृति (एलर्जी) है। इसका अर्थ है कि हमारे शरीर की प्रणाली उन विशेष पदार्थों को सहन नहीं कर पाती और जिस रूप में अपनी प्रतिक्रिया या विरोध प्रकट करती है, उसे एलर्जी कहते हैं। हमारी श्वसन प्रणाली जब किन्हीं एलर्जेंस के प्रति एलर्जी प्रकट करती है तो वह अस्थमा होता है। यह साँस संबंधी रोगों में सबसे अधिक कष्टदायी है। अस्थमा के रोगी को सांस फूलने या साँस न आने के दौरे बार-बार पड़ते हैं और उन दौरों के बीच वह अकसर पूरी तरह सामान्य भी हो जाता है।

"दमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन इस पर नियंत्रण जरूर किया जा सकता है,ताकि दमे से पीड़ित व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सकेअस्थमा तब तक ही नियंत्रण में रहता है, जब तक मरीज जरूरी सावधाननियां बरत रहा है।"
दमा रोग के लक्षण:-
Asthma – SIGNS AND SYMPTOMS
इस रोग के लक्षण व्यक्ति के अनुसार बदलते हैं। अस्थमा के कई लक्षण तो ऐसे हैं, जो अन्य श्वास संबंधी बीमारियों के भी लक्षण हैं। इन लक्षणों को अस्थमा के अटैक के लक्षणों के रूप में पहचानना जरूरी है।दमा रोग में रोगी को सांस लेने तथा सांस को बाहर छोड़ने में काफी जोर लगाना पड़ता है। जब मनुष्य के शरीर में पाई जाने वाले फेफड़ों की नलियों (जो वायु का बहाव करती हैं) की छोटी-छोटी तन्तुओं (पेशियों) में अकड़न युक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़ा वायु (श्वास) की पूरी खुराक को अन्दर पचा नहीं पाता है। जिसके कारण रोगी व्यक्ति को पूर्ण श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ देने को मजबूर होना पड़ता है। इस अवस्था को दमा या श्वास रोग कहा जाता है। दमा रोग की स्थिति तब अधिक बिगड़ जाती है तब रोगी को श्वास लेने में बहुत दिक्कत आती है क्योंकि वह सांस के द्वारा जब वायु को अन्दर ले जाता है तो प्राय: प्रश्वास (सांस के अन्दर लेना) में कठिनाई होती है तथा नि:श्वास (सांस को बाहर छोड़ना) लम्बे समय के लिए होती हैं। दमा रोग से पीड़ित व्यक्ति को सांस लेते समय हल्की-हल्की सीटी बजने की आवाज भी सुनाई पड़ती है।

जब दमा रोग से पीड़ित रोगी का रोग बहुत अधिक बढ़ जाता है तो उसे
दौरा आने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक दिक्कत आती है तथा व्यक्ति छटपटाने लगता है। जब दौरा अधिक क्रियाशील होता है तो शरीर में ऑक्सीजन के अभाव के कारण रोगी का चेहरा नीला पड़ जाता है। यह रोग स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है। जब दमा रोग से पीड़ित रोगी को दौरा पड़ता है तो उसे सूखी खांसी होती है और ऐंठनदार खांसी होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी चाहे कितना भी बलगम निकालने के लिए कोशिश करे लेकिन फिर भी बलगम बाहर नहीं निकलता है। अस्थमा के सभी रोगियों को रात के समय, खासकर सोते हुए, ज्यादा कठिनाई महसूस होती है।

इसके मुख्य लक्षण कुछ इस प्रकार हैं ….
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को रोग के शुरुआती समय में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ने लगते हैं।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को वैसे तो दौरे कभी भी पड़ सकते हैं लेकिन रात के समय में लगभग 2 बजे के बाद दौरे अधिक पड़ते हैं।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को कफ सख्त, बदबूदार तथा डोरीदार निकलता है।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को सांस लेनें में बहुत अधिक कठिनाई होती है।
  • सांस लेते समय अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है।
  • लगातार छींक आना 
  • सामान्यतया अचानक शुरू होता है 
  • यह किस्तों मे आता है 
  • रात या अहले सुबह बहुत तेज होता है 
  • ठंडी जगहों पर या व्यायाम करने से या भीषण गर्मी में तीखा होता है 
  • दवाओं के उपयोग से ठीक होता है, क्योंकि इससे नलिकाएं खुलती हैं 
  • बलगम के साथ या बगैर खांसी होती है 
  • सांस फूलना, जो व्यायाम या किसी गतिविधि के साथ तेज होती है 
  • शरीर के अंदर खिंचाव (सांस लेने के साथ रीढ़ के पास त्वचा का खिंचाव)
अस्थमा के लिए जांच (Screening for Asthma)
शहरों में पोल्यूशन बढने की वजह से अस्थमा रोगियों की संख्यां हर रोज बढ रही है। अस्थमा या दमा एक गंभीर वीमारी है जो श्वांस नलिकाओं को प्रभावित करती है। अस्थमा होने पर श्वांस नलिकाओं की भीतरी दीवार पर सूजन आ जाती है। इस स्थिति में सांस लेने में दिक्कत होती है और फेफड़ों में हवा की मात्रा कम हो जाती है। इससे खांसी आती है, नाक बजती है, छाती कड़ी हो सकती है, रात और सुबह में सांस लेने में तकलीफ आदि दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। दमा का दौरा पडने पर श्वांस नलिकाएं पूरी तरह बंद हो जाती हैं जिससे शरीर के महत्व पूर्ण अंगों में आक्सीजन की आपूर्ति बंद हो जाती है। अस्थंमा एक गंभीर बीमारी है और इसका दौरा पडने पर व्यक्ति की मौत तक हो सकती है।
स्पिरोमेटी
यह एक सामान्य प्रकार का टेस्ट होता है जो किसी भी मेडिकल क्लिनिक में हो सकता सकता है। इस जांच से सांस लेने की दिक्कमत या हृदय रोग को पहचाना जा सकता है। इस जांच से आदमी के सांस लेने की गति का पता चलता है।
पीक फ्लो
इस जांच द्वारा पता लगया जा सकता है कि आदमी अपने फेफडे से कितनी तेजी से और आसानी से सांसों को बाहर कर रहा हे। अस्थमा को बेहतर तरीके से कंट्रोल करने के लिए यह जरूरी है कि आप अपनी सांसों को तेजी से बाहर निकालें। इस मशीन में एक मार्कर होता है जो सांस बाहर निकालते समय स्लाइड को बाहर की ओर ढकेलता है।
चेस्टन एक्सरे
अस्थमा में चेस्ट का एक्सरे कराना चाहिए। चेस्ट एक्सरे द्वारा अस्थमा को फेफडे की अन्य वीमारियों से अलग किया जा सकता है। एक्सरे द्वारा अस्थमा को देखा नहीं जा सकता लेकिन इससे संबंधित स्थितियां जानी जा सकती हैं।
एलर्जी टेस्ट
कई बार डॉक्टर एलर्जी टेस्ट के बारे में सलाह देते हैं, इस टेस्ट से यह पता लगाया जा सकता है कि आदमी कि टिगर्स की सही स्थिति क्‍या है और कौन सी परिस्थितियां आपको प्रभावित कर सकती हैं।
स्किन प्रिक टेस्ट
स्किन प्रिक टेस्ट बहुत साधारण तरीके से होता है और एलर्जिक टिगर्स जानने का बहुत ही प्रभावी तरीका होता है। यह बहुत ही सस्ता, तुरंत रिजल्ट देने वाला और बहुत ही सुरक्षित टेस्ट होता है।
ब्लड टेस्ट
ब्लड टेस्ट, द्वारा अस्थमा का पता नहीं लगाया जा सकता है लेकिन शरीर के त्वचा की एलर्जी के लिए यह टेस्ट बहुत ही कारगर होता है।
शारीरिक परीक्षण
अस्थमा की जांच के लिए डॉक्टर आपका शारीरिक परीक्षण भी कर सकते हैं जैसे, चेस्ट के घरघराहट की आवाज सुनना। चेस्टं के घरघराहट की आवाज से अस्थतमा की गंभीरता को पहचाना जा सकता है।
दमा रोग होने का कारण:-
अब हम अस्थमा होने के कारणों पर प्रकाश डालते हैं ,यह  कारणों से हो सकता है। अनेक लोगों में यह एलर्जी मौसम, खाद्य पदार्थ, दवाइयाँ इत्र, परफ्यूम जैसी खुशबू और कुछ अन्य प्रकार के पदार्थों से हो सकता हैं; कुछ लोग रुई के बारीक रेशे, आटे की धूल, कागज की धूल, कुछ फूलों के पराग, पशुओं के बाल, फफूँद और कॉकरोज जैसे कीड़े के प्रति एलर्जित होते हैं। जिन खाद्य पदार्थों से आमतौर पर एलर्जी होती है उनमें गेहूँ, आटा दूध, चॉकलेट, बींस की फलियाँ, आलू, सूअर और गाय का मांस इत्यादि शामिल हैं। कुछ अन्य लोगों के शरीर का रसायन असामान्य होता है, जिसमें उनके शरीर के एंजाइम या फेफड़ों के भीतर मांसपेशियों की दोषपूर्ण प्रक्रिया शामिल होती है। अनेक बार अस्थमा एलर्जिक और गैर-एलर्जीवाली स्थितियों के मेल से भड़कता है, जिसमें भावनात्मक दबाव, वायु प्रदूषण, विभिन्न संक्रमण और आनुवंशिक कारण शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार, जब माता-पिता दोनों को अस्थमा या हे फीवर (Hay Fever) होता है तो ऐसे 75 से 100 प्रतिशत माता-पिता के बच्चों में भी एलर्जी की संभावनाएँ पाई जाती हैं।इसके कुछ मुख्य कारण ये हैं….  
  • खान-पान के गलत तरीके से दमा रोग हो सकता है। 
  • मानसिक तनाव, क्रोध तथा अधिक भय के कारण भी दमा रोग हो सकता है। 
  • खून में किसी प्रकार से दोष उत्पन्न हो जाने के कारण भी दमा रोग हो सकता है। 
  • नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है। 
  • खांसी, जुकाम तथा नजला रोग अधिक समय तक रहने से दमा रोग हो सकता है। 
  • नजला रोग होने के समय में संभोग क्रिया करने से दमा रोग हो सकता है। 
  • भूख से अधिक भोजन खाने से दमा रोग हो सकता है। 
  • मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य पदार्थों तथा गरिष्ठ भोजन करने से दमा रोग हो सकता है। 
  • फेफड़ों में कमजोरी, हृदय में कमजोरी, गुर्दों में कमजोरी, आंतों में कमजोरी, स्नायुमण्डल में कमजोरी तथा नाकड़ा रोग हो जाने के कारण दमा रोग हो जाता है। 
  • मनुष्य की श्वास नलिका में धूल तथा ठंड लग जाने के कारण दमा रोग हो सकता है। 
  • धूल के कण, खोपड़ी के खुरण्ड, कुछ पौधों के पुष्परज, अण्डे तथा ऐसे ही बहुत सारे प्रत्यूजनक पदार्थों का भोजन में अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है। 
  • मनुष्य के शरीर की पाचन नलियों में जलन उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से भी दमा रोग हो सकता है। 
  • मल-मूत्र के वेग को बार-बार रोकने से दमा रोग हो सकता है। 
  • धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रहने या धूम्रपान करने से दमा रोग हो सकता है।यदि गर्भावस्था के दौरान कोई महिला तंबाकू के धुएं के बीच रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा होने का खतरा होता है।
  • औषधियों का अधिक प्रयोग करने के कारण कफ सूख जाने से दमा रोग हो जाता है।
  • जानवरों से (जानवरों की त्वचा, बाल, पंख या रोयें से)
  • ठंडी हवा या मौसमी बदलाव 
  • मजबूत भावनात्मक मनोभाव (जैसे रोना या लगातार हंसना) और तनाव 
  • पारिवारिक इतिहास, जैसे  की परिवार में पहले किसी को अस्थमा रहा हो तो आप को अस्थमा होने की सम्भावना है। 
  • मोटापे से भी अस्थमा हो सकता है। अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं।
  • सिर्फ पदार्थ ही नहीं बल्कि भावनाओं से भी दमे का दौरा शुरू हो सकता है। जैसे क्रोध, रोना व विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाएं।

दमा रोग से पीड़ित रोगी के लिए कुछ सावधानियां:-
Asthma patient some precautions
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की अवस्था और खराब हो सकती है।घर में या अस्थमा से प्रभावित लोगों के आस -पास धूम्रपान न करें संभव हो तो धूम्रपान ही करना बंद कर दें क्योंकि अस्थमा से प्रभावित कुछ लोगों को कपडों पर धुएं की महक से ही अटैक आ सकता है |
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में लेसदार पदार्थ तथा मिर्च-मसालेदार चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • रोगी व्यक्ति को धूल तथा धुंए भरे वातावरण से बचना चाहिए क्योंकि धुल तथा धुंए से यह रोग और भी बढ़ जाता है।
  • रोगी व्यक्ति को मानसिक परेशानी, तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़ो से बचना चाहिए।
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को शराब, तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ दमा रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं। 
  • एयरटाइट गद्दे .बॉक्स स्प्रिंग और तकिए के कवर का इस्तेमाल करें ये वे चीजें है जहां पर अक्सर धूल-कण होते है जो अस्थमा को ट्रिगर करते है 
  • पालतू जानवरों को हर हफ्ते नहलाएं,इससे आपके घर में गंदगी पर कंट्रोल रहेगा | 
  • अस्थमा से प्रभावित बच्चों को उनकी उम्र वाले बच्चों के साथ सामान्य गतिविधियों में भाग लेने दें | 
  • अस्थमा के बारे में अपनी और या अपने बच्चे की जानकारी बढाएं इससे इस बीमारी पर अच्छी तरह से कंट्रोल करने की समझ बढेगी | 
  • बेड सीट और मनपसंद स्टफड खिलोंनों को हर हफ्ते धोंए वह भी अच्छी क्वालिटीवाल एलर्जक को घटाने वाले डिटर्जेंट के साथ | 
  • सख्त सतह वाले कारपेंट अपनाए | 
  • एलर्जी की जांच कराएं इसकी मदद से आप अपने अस्थमा ट्रिगर्स मूल कारण की पहचान कर सकते है |
  • किसी तरह की तकलीफ होने पर या आपकी दवाइयों के आप पर बेअसर होने पर अपने डॉक्टर से संर्पक करें | 
  • यदि आपके घर में पालतू जानवर है तो उसे अपने विस्तर पर या बेडरूम में न आने दें | 
  • पंखोंवाले तकिए का इस्तेमाल न करें | 
  • मोल्ड की संभावना वाली जगहों जैसे गार्डन या पत्तियों के ढेरों में काम न करें और न ही खेलें | 
  • दोपहर के वक्त जब परागकणों की संख्या बढ जाती है बाहर न ही काम करें और न ही खेलें | 
  • अस्थमा से प्रभावित व्यक्ति से किसी तरह का अलग व्यवहार न करें | 
  • अस्थमा का अटैक आने पर न घबराएं.इससे प्रॉब्लम और भी बढ जाएगी. ये बात उन माता-पिता को ध्यान देने वाली है जिनके बच्चों को अस्थमा है अस्थमा अटैक के दौरान बच्चों को आपकी प्रतिक्रिया का असर पडता है यदि आप ही घबरा जाएंगे तो आपको देख उनकी भी घबराहट और भी बढ सकती है | एलर्जी की जांच कराएं इसकी मदद से आप अपने अस्थमा ट्रिगर्स मूल कारण की पहचान कर सकते है 

क्या अस्थमा इन मायनों में आपके जीवन को प्रभावित कर रहा है!
  • क्या आप मेलों, चिड़ियाघर और अन्य सार्वजनिक जगह पर जाने से डरते है? 
  • क्या आप उद्यान में जाने से डरते है? 
  • क्या आप सार्वजनिक स्थानों से बचते है? 
  • क्या आप एयर कंडीशनर के आसपास में बेठने से डरते है?
  • क्या आप ठंढे पेय या फलों को खाने से डरते हैं?
  • क्या आप सीढियाँ चढ़ने से डरते हैं? 
  • क्या आपके हमेशा यह तनाव रहता है की मुझे कही भी अस्थमा का दौरा पड़ सकता है? 
  • क्या आप जॉगिंग या व्यायाम करने से भी डरते है की कही आपको अस्थमा का दौरा न पड़ जाये?
दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
  • सबसे पहले पेट पर मिट्टी की पट्टी सुबह-शाम रखकर कब्ज के कारण आतों में सचित मल को मुलायम करे। तत्पश्चात एनिमा या वस्ति क्रिया अथवा अरंडी के तेल से ‘गणेश क्रिया’ करके कब्ज को तोड़े।
  • नाक के बढ़े हुए मास या हड्डी से छुटकारा पाने के लिए तेल नेति, रबर नेति व नमक पड़े हुए गर्म पानी से जल नेति करे।
  • फेफड़े में बसी ठडक निकालने के लिए छाती और पीठ पर कोई गर्म तासीर वाला तेल लगाकर ऊपर से रुई की पर्त बिछाकर रातभर या दिन भर बनियान पहने रहें।
  • बायीं नासिका के छिद्र में रुई लगाकर बन्द कर लेने से दाहिनी नासिका ही चलेगी। इस स्वर चिकित्सा से दमा के रोगियों को बहुत आराम मिलता है।
  • भोजन में प्रात: तुलसी, अदरक, गुलबनफसा आदि की चाय या सब्जी का सूप, दोपहर में सादी रोटी व हरी सब्जी, गर्म दाल, तीसरे पहर सूप या देशी चाय और रात्रि में सादे तरीके से बनी मिश्रित हरी सब्जिया माइक्रोवेब या कुकर से वाष्पित (स्ट्रीम्ड) सब्जियों का सेवन करे।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी है जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभाति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तामन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि। 
  • कंबल या दरी बिछाकर घुटनों के बल लेट जाएं और अपने दाहिने पांव को घुटने से मोड़कर नितंब के नीचे लगा दें। अब बाएं पांव को भी घुटने से मोड़कर, बाएं भुजदण्ड पर रख लें और दोनों हाथों को गर्दन के पीछे ले जाकर परस्पर मिला लें। इस आसन की यही पूर्ण स्थिति है।इस आसन से फेंफड़ों में शक्ति आती है। दमा और क्षय आदि रोगों को यह शांत करता है। साथ ही हाथ-पांवों में लचीलापन और दृढ़ता लाकर उन्हें मजबूत बनाता है। यह आसन लड़के और लड़कियों के लिए बेहद फायदेमंद है।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल जो प्राकृतिक चिकित्सा से बनाया गया है उसे लगभग 25 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्राल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है। 
  • शरीर शोधन में कफ के निवारण के लिए वमन (उल्टी) लाभप्रद उपाय है। श्वास के रोगी को आमाशय, आतों और फेफड़ों के शुद्धीकरण के लिए अमलतास' का विरेचन विशेष लाभप्रद है। इसके लिए 250 मि.ली. पानी में 5 से 10 ग्राम अमलतास का गूदा उबालें। चौथाई शेष रहने पर छानकर रात को सोते समय दमा पीड़ित शख्स को चाय की तरह पिला दें।
  • हमेशा खुश रहें , खिलखिलाकर हंसें और अपनी जीवनशैली संयमित रखें।
अस्थमा के लिए उचित आहार :-
Proper diet for asthma
  • जो लोग आस्थमा जैसी बीमारी से लड़ रहे हैं, उनके लिए सबसे ज़रूरी है खाने में एण्टीआक्सिडेंट का इस्तेमाल। एण्टीआक्सिडेंट सीधा फेफड़ों में जाकर फेफड़ों की बीमारियों से और सांसों की बीमारियों से लड़ते हैं। वो खाद्य पदार्थ जिनमें विटामिन सी और ई होते है वो हर प्रकार की सूजन कम करते हैं। 
  • साइट्रस फूड जैसे संतरे का जूस, हरी गोभी में विटामिन सी की मात्रा अधिक पायी जाती हैं और यह अस्‍थमा के मरीज़ों के लिये  अच्‍छे होते हैं। 
  • ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमे विटामिन ए की मात्रा अधिक होती है वो फेफड़ों से एलर्जेन निकालने में बहुत उपयोगी होते हैं। 
  • ऐसे फल व सब्ज़ियां जो गहरे रंग की होती हैं उनमें बीटा कैरोटिन की मात्रा बहुत अधिक होती है जैसे गाज़र, गहरे हरे रंग की सब्ज़ियां पालक आदि। फल व सब्ज़ियों का रंग जितना गहरा होता है उनमें एण्टीआक्सिडेंट की मात्रा उतनी ही अधिक होती है। 
  • विटामिन ई का उपयोग ज़्यादातर खाना बनाने के तेल में होता है। लेकिन अस्थमा के मरीज़ को इसका उपयोग कम कर देना चाहिए। 
  • विटामिन ई गेहूं, पास्ता और ब्रेड में भी पाया जाता है लेकिन इन आहार में विटामिन की मात्रा कम होती है। 
  • ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें विटामिन बी की मात्रा ज़्यादा होती है जैसे दाल और हरी सब्ज़ियां, वो अस्थमैटिक्स को अटैक से बचाती हैं। ऐसा भी पाया गया है कि अस्थमैटिक्स में नायसिन और विटामिन बी 6 की कमी होती है। 
  • कच्चे प्याज़ में सल्फर की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है जिससे कि आस्थमा के मरीजों को बहुत लाभ मिलता है। 
  • ओमेगा 3 फैटी एसिड फेफड़ों में हुई सूजन को कम करने के साथ बार बार हो रहे आस्थमा अटैक से भी बचाने में मदद करता है। ओमेगा 3 फैटी एसिड मछलियों में पाया जाता है। 
  • सेलेनियम भी फेफड़ों में हुई सूजन को कम करने में उपयोगी होता है। अगर सेलेनियम के साथ अस्थमैटिक्स द्वारा विटामिन सी और ई भी लिया जा रहा है तो प्रभाव दोगुना हो जाता है। सेलेनियम सी फूड, चिकेन और मीट में भी पाया जाता है। 
  • वो खाद्य पदार्थ जिनमें कि मैगनिशीयम की मात्रा ज़्यादा होती है वो श्वास नली से अतिरिक्त हवा को अन्दर आने देते हैं जिससे कि सूजन पैदा करने वाले सेल्स भी कम हो जाते है। मैग्निशीयम की मात्रा पालक, हलिबेट, ओएस्टर में ज़्यादा होती है। कुछ खाने पीने की चीज़ों से श्वासनली में मौजूद म्यूकस बहुत पत्ला और पानी सा हो जाता है जैसे स्पाइसी खाना अदरक, प्याज़ आदि। 
  • हाल के सर्वेक्षण से पता चलता है कि फैट युक्त पदार्थ जैसे दूध, बटर से अस्थमा की तीव्रता कम हो जाती है। वो बच्चे जो ज़्यादा फैट युक्त आहार लेते है उनकी तुलना में वो बच्चे जो फैट युक्त आहार कम लेते हैं, उनमें आस्थमा की सम्भावना अधिक होती है। 
  • आस्थमा अटैक के समय कॉफी  बहुत ही फायदेमंद सिद्ध हो सकती है क्योंकि कैफीन थियोफाइलिन से बहुत ही मिलता जुलता है और थियोफाइलिन का इस्तेमाल कई दवाओं में होता है, जिससे कि सांस लेने में मदद मिलती है। लेकिन वो लोग जो थियोफाइलिन ले रहे है उन्हें कैफीन युक्त चाय, काफी या कोल्ड ड्रिंक नहीं लेना चाहिए क्योंकि थियोफाइलिन और कैफीन मिलकर टाक्सिक हो सकते हैं। अगर आपके अटैक का कारण चिन्ता है तो आप ज़्यादा मात्रा में कैफीन ले सकते हैं।
  • अस्थमा के रोगी को शीतल खाद्य पदार्थो और शीतल पेयों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • उष्ण मिर्च-मसाले व अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थो का सेवन न करें।
  • भोजन में अरबी, कचालू, रतालू, फूलगोभी आदि का सेवन न करें।
  • अस्थमा के रोगी को केले नहीं खाने चाहिए।
  • उड़द की दाल से बने खाद्य पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • अस्थमा के रोगी को दही और चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • समुद्री मछली, सैल्मन, ट्यूना और कॉड लिवर इत्यादि को मिलाकर ही फिश ऑयल और फिश के अन्य उत्पादों का निर्माण किया जाता है। फिश ऑयल में ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है जो कि बहुत जल्दी अस्‍थमा रोगियों को ठीक करने में कारगार है। यानी यदि अस्थमा रोगी फिश ऑयल का सेवन करते हैं तो ये उनके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभदायक है। इससे गले में आने वाली सूजन से निजात मिलती हैं। जो बच्चे श्वास दमा (bronchial asthma) के शिकार होते हैं उनके लिए फिश ऑयल का सेवन बहुत फायदेमंद है। अस्थमा रोगियों के लिए रोजाना तीन ग्राम फिश ऑयल लेना उनके अस्थमा की समस्याओं को दूर कर सकता है। लेकिन यदि इससे अधिक फिश ऑयल लिया जाता है तो सांस संबंधी विकार, दस्त की समस्या और नाक से खून बहना इत्यादि की समस्या हो सकती है। अस्थमा के दौरान आराम पाने के लिए फिश ऑयल के बदले दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए। अस्थमा से निजात पाने के लिए फिश ऑयल का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए। अस्थमा के अलावा फिश ऑयल से दिल की बीमारियां, अलजाइमर रोग, अर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों को भी कम किया जा सकता है।
  • मछली के नियमित सेवन से आप कई बीमारियों से निजात पा सकते हैं। जब बात हो अस्थमा की तो अस्थमैटिक मरीजों को अस्थमा से जुड़ी समस्याओं से निजात पाने के लिए निश्चित रूप से मछली का सेवन करना चाहिए। फैटी फिश अस्थमा रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद होती है। अस्थमा के मरीजों को सप्ताह में कम से कम दो बार मछली का सेवन जरूर करना चाहिए। इससे ना सिर्फ वे आसानी से सांस ले सकते हैं बल्कि उनके गले की सूजन, खराश, संकरी श्‍वासनली इत्यादि में भी सुधार होता है। क्या आप जानते हैं जो अस्थमैटिक मरीज सप्ताह में दो बार मछली का सेवन करते हैं, ऐसे मरीजों में लगभग 90 फीसदी अस्थमा की समस्याएं कम हो जाती हैं।

अस्थमा को नियन्त्रित करने के कुछ उपाय इस प्रकार हैं :-
  • तुलसी के पत्तों को अच्छी तरह से साफ कर उनमें पिसी काली मिर्च डालकर खाने के साथ देने से दमा नियंत्रण में रहता है
  • दमे का दौरा बार-बार न पड़े इसके लिए हल्दी और शहद मिलाकर चांटना चाहिए।
  • तुलसी दमे को नियंत्रि‍त करने में लाभकरी है। तुलसी को पानी के साथ पीसकर उसमें शहद डालकर चाटने से दमे से राहत मिलती है।
  • दमे आमतौर पर एलर्जी के कारण भी होता है। ऐसे में एलर्जी को नियंत्रि‍त करने के लिए दूध में हल्दी डालकर पीनी चाहिए।
  • शहद की गंध को दमे रोगी को सुधांने से भी आराम मिलता है।
  • नींबू पानी दमे के दौरे को नियंत्रि‍त करता है। खाने के साथ प्रतिदिन दमे रोगी को नींबू पानी देना चाहिए।
  • आंवला खाना भी ऐसे में अच्छा रहता है। आंवले को शहद के साथ खाना तो और भी अच्छा है।
  • गर्म पानी में अजवाइन डालकर स्टीम लेने से भी दमे को नियंत्रि‍त करने में राहत मिलती है।
  • अस्थमा रोगी को लहसून की चाय या फिर दूध में लहसून उबालकर पीना भी लाभदायक है।
  • सरसों के तेल को गर्म कर छाती पर मालिश करने से दमे के दौरे के दौरान आराम मिलता है।
  •  मेथी के बीजों को पानी में पकाकर पानी जब काढ़ा बन जाए तो उसे पीना दमें में लाभकारी होता है।
  • लौंग को गर्म पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर उसमें शहद डालकर पीने से दमे को नियंत्रि‍त करने में आसानी होती है।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को नारियल पानी, सफेद पेठे का रस, पत्ता गोभी का रस, चुकन्दर का रस, अंगूर का रस, दूब घास का रस पीना बहुत अधिक लाभदायक रहता है।
  • तुलसी तथा अदरक का रस शहद मिलाकर पीने से दमा रोग में बहुत लाभ मिलता है।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि मेथी को भिगोकर खायें तथा इसका पाने में थोड़ा सा शहद मिलाकर पिए तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को 1 चम्मच त्रिफला को नींबू पानी में मिलाकर सेवन करने से दमा रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता हैं। 
  • 1 कप गर्म पानी में शहद डालकर प्रतिदिन दिन में 3 बार पीने से दमा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। 
  • दमा रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में नमक तथा चीनी का सेवन बंद कर देना चाहिए। 
  • लहसुन दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है। 30 मिली दूध में लहसुन की पांच कलियां उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है। 
  • अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सबेरे और शाम इस चाय का सेवन करने से मरीज को फायदा होता है।
  • दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें, यह घरेलू उपाय काफी फायदेमंद होता है। 4-5 लौंग लें और 125 मिली पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएँ और गरम-गरम पी लें। हर रोज दो से तीन बार यह काढ़ा बनाकर पीने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है। 
  • 180 मिमी पानी में मुट्ठीभर सहजन की पत्तियां मिलाकर करीब 5 मिनट तक उबालें। मिश्रण को ठंडा होने दें, उसमें चुटकीभर नमक, कालीमिर्च और नीबू रस भी मिलाया जा सकता है। इस सूप का नियमित रूप से इस्तेमाल दमा उपचार में कारगर माना गया है। 
  • अदरक का एक चम्मच ताजा रस, एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलाएं। दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजवाब साबित होता है। मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथीदाना और एक कप पानी उबालें। हर रोज सबेरे-शाम इस मिश्रण का सेवन करने से निश्चित लाभ मिलता है।
  • १८० मि.मी.पानी में मुट्ठी भर सहजन की पत्तियां मिलकर करीब ५ मिनट तक उबालें मिश्रण को ठंडा होने दें उसमे चुटकी भर नमक , काली मिर्च और नीबू भी मिलाया जा सकता है इस सूप का नियमित रूप से इस्तेमाल दमा उपचार में कारगर माना गया है ।
  • अदरख का एक चम्मच ताजा रस , एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलें दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजबाब साबित होता है ।
  • मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथी दाना , औए एक कप पानी उबालें हर रोज सुबह - शाम इस मिश्रण का सेवन करने से निश्चित लाभ मिलता है ।
  • लहसुन भी दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है ३० मि.ली.दूध में लहसुन की ५ कलियाँ उबालें और इस मिश्रण को हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है अदरख की गर्म चाय में लहसुन की दो पिसी कलियाँ मिलाकर पिने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है सुबह-शाम इस चाय के सेवन करने से मरीज को फायदा होता है ।
  • दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें यह घरेलु उपाय काफी फायदेमंद रहता है ।
  • ४-५ लौंग लें और १२५ मि.ली.पानी में ५ मिनट तक उबालें इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलें और गर्म-गर्म पि लें हर रोज दो -तीन बार यह काढ़ा बनाकर पिने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है ।
  • दमे को नियंत्रित रखने के लिए शहद और तुलसी की पत्तियों का पीसकर मिश्रण तैयार करें और प्रतिदिन सुबह सुबह इसका सेवन करें 
  • यदि आपको एलर्जी पैदा करने वाला तत्व अपने आसपास नजर आए और आपको लगे की दमा भड़क सकता है तो इसे में तत्काल तुलसी की पत्तियों में सेंधा नमक मिलाकर सेवन करे ।
  • श्वसन मार्ग को स्वच्छ रखने के लिए दूध के साथ भुने चनों का प्रयोग करें ।
  • एक चम्मच शहद हल्दी का चूर्ण मिलाकर सेवन करना भी अस्थमा का एक और बेहद कारगर घरेलु उपचार है ।
  • अस्थमा से तत्काल अस्थाई राहत पाने के लिए काली मिर्च में तुलसी  की पत्तियां मिलाकर सेवन करे ।
  • प्रति दिन एक गिलास दूध में हल्दी चूर्ण मिलाकर पीने से भी लाभ मिलता है खाली  पेट हल्दी दूध पीने से ज्यादा फायदा होता है जिन तत्वों से दमा भड़कने की आशंका हो या साँस लेने में तकलीफ बढ़ती हो उससे बचने की कोशिश करे अस्थमा के मरीज को नियमित रूप से अलग-अलग किस्म की दालों और सूखे अंगूरों का सेवन करना चाहिए ताकि यह रोग दूर रहे तली भुनी सामग्री का सेवन न करे और रात के समय मरीज को हल्का भोजन करने से भी फायदा मिलता है ।
  • शहद एक सबसे आम घरेलू उपचार है, जो कि अस्‍थमा के इलाज के लिये प्रयोग होती है। अस्‍थमा अटैक आने पर शहद वाले पानी से भाप लेने से जल्‍द राहत मिलती है। इसके अलावा दिन में तीन बार एक ग्‍लास पानी के साथ शहद मिला कर पीने से बीमारी से राहत मिलती है। शहद बलगम को ठीक करता है, जो अस्‍थमा की परेशानी पैदा करता है। 
  • एक कप घिसी हुई मूली में एक  चम्‍मच शहद और नींबू का रस मिला कर 20 मिनट तक पकाएं। इस मिश्रण को हर रोज एक चम्‍मच खाएं। यह इलाज बड़ा ही प्रसिद्ध और असरदार है। 
  • रातभर एक गरम पानी वाले ग्‍लास में सूखी अंजीर को भिगो कर रख दें। सुबह होते ही इसे खाली पेट खाएं। ऐसा करने से बलगम भी ठीक होता है और संक्रमण से भी राहत मिलती है। 
  • करेला, जो कि अस्‍थमा का असरदार इलाज है, उसके एक चम्‍मच पेस्‍ट को लेकर शहद और तुलसी के पत्‍ते के रस के साथ मिला कर खाएं। इससे अंदर की एलर्जी से बहुत राहत मिलती है। 
  • अंदर की एलर्जी को सही करने के लिये मेथी भी बहुत असरदार होती है। एक ग्‍लास पानी के साथ मेथी के कुछ दानों को तब तक उबालें, जब तक पानी एक तिहाई न हो जाए। अब उसी पानी में शहद और अदरक का रस मिला लें। इस रस को दिन में एक बार पीने से जरुर राहत मिलेगी।
  • 10 ग्राम सरसों का तेल और 10 ग्राम गुड़ को हल्का गुनगुना कर प्रतिदिन सुबह लें। इस नुस्खे को 21 से 40 दिनों तक प्रयोग करें।
  • एक चम्मच अदरक का रस + एक चम्मच तुलसी का रस+ एक चम्मच शहद सुबह-शाम लें।
  • शुद्ध आवलासार गधक 2 ग्राम + 2 ग्राम कालीमिर्च पीसकर, 10 ग्राम गाय के घी में मिलाकर चाटें। प्रतिदिन सुबह एक बार 15 दिनों तक। 
  • मदार या आक का एक पत्ता + 25 दाने कालीमिर्च ठीक से पीसकर 250 मि.ग्रा. की गोलिया बना लें। 1 से 2 गोली शहद से प्रतिदिन लें। 
  • कालीमिर्च, छोटी पीपल और भुना सुहागा समान मात्रा में लेकर, पीसकर, छानकर रखें। इस चूर्ण को 2 से 4 ग्राम मात्रा में सुबह-शाम शहद से सेवन करें। 
  • आयुर्वेद के योग जैसे श्वास कास चितामणि रस, श्वास कुठार रस, स्वर्ण बसत मालती रस, लक्ष्मी बिलास रस, अभ्रक भस्म, अगस्त्य हरीतिकी, कंटकार्यावलेह, वासावलेह, ब्याघ्री-हरीतकी और कनकासव आदि का प्रयोग योग्य चिकित्सक के परामर्श से करना चाहिए।
  • अनार के दानों को कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर, 3 ग्राम चूर्ण मधु के साथ दिन में दो बार सेवन करें।
  • खजूर की गुठली निकालकर, सोंठ के चूर्ण के साथ पान में रखकर खांए।
  • अस्थमा में श्वास अवरोध होने पर कॉफी पिएं।
  • कोष्ठबद्धता के कारण रोगी को बहुत परेशानी होती है। कोष्ठबद्धता को नष्ट करने के लिए रात्रि को एरंड का तेल 5 ग्राम मात्रा में दूध या हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें।
  • दूध में दो पीपल उबालकर, छानकर सेवन करें।
  • सैंधावादि तेल की छाती पर मालिश करने से अस्थमा रोग में बहुत आराम मिलता है।
  • चौलाई की सब्जी बनाकर खाने से अस्थमा रोगी को बहुत लाभ होता है।
  • तीन-चार लौंग जल में उबालकर, छानकर, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पीने से अस्थमा का प्रकोप नष्ट होता है।
  • नीबू का रस, अदरक का रस और मधु मिलाकर सेवन करने से श्वास प्रकोप की पीड़ा कम होती है।
  • दमा में सरसों का तेल और गुड़ मिलाकर चाटने से भी आराम पहुंचता है और कफ भी निकल जाता है।
  • दमे के रोगी को नित्य प्रात: एक नींबू, दो चम्मच शहद और एक चम्मच अदरक का रस एक कप पानी में पीते रहने से बहुत लाभ होता है। दमे के दौरे के समय भी दिया जा सकता है।
  • दमा के रोगी के लिए अंगूर का सेवन बहुत लाभदायक है।
  • रात को सोने से पहले भुने चने खाकर ऊपर से थोड़ा-सा गरम दूध पीना भी लाभप्रद है।
  • गाजर का रस सुबह व दोपहर प्रतिदिन पीने से इस रोग से मुक्ति में सहारा मिलता है।
  • रात को सोने से पूर्व एक दो काली मिर्च लेने से भी आराम पहुंचता है।
  • एक पका केला छिला लेकर चाकू से लम्बाई में चीरा लगाकर उसमें एक छोटा चम्मच दो ग्राम कपड़छान की हुई काली मिर्च भर दें । फिर उसे बगैर छीलेही, केले के वृक्ष के पत्ते में अच्छी तरह लपेट कर डोरे से बांध कर 2-3 घंटे रख दें । बाद में केले के पत्ते सहित उसे आग में इस प्रकार भूने की उपर का पत्ता जले । ठंडा होने पर केले का छिलका निकालकर केला खा लें ।प्रतिदिन सुबह में केले में काली मिर्च का चूर्ण भरें। और शाम को पकावें ।15-20 दिन में खूब लाभ होगा ।
  • केला के पत्तों को सुखाकर किसी बड़े बर्तन में जला लेवें। फिर कपड़छान कर लें और इस केले के पत्ते की भरम को एक कांच की साफ शीशी या डिब्बे में रख लें । बस, दवा तैयार है ।
  •  एक साल पुराना गुड़ 3 ग्राम चिकनी सुपारी का आधा से थोड़ा कम वनज को 2-3 चम्मच पानी में भिगों दें । उसमें 1-4 चौथाई दवा केले के पत्ते की राख डाल दें और पांच-दस मिनट बाद ले लें । दिनभर में सिर्फ एक बार ही दवा लेनी है, कभी भी ले लेवें ।
  • बच्चे का असाध्य दमा - अमलतास का गूदा 15 ग्राम दो कप पानी में डालकर उबालें चौथाई भाग बचने पर छान लें और सोते समय रोगी को गरम-गरम पिला दें । फेफड़ों में जमा हुआ बलगम शौच मार्ग से निकल जाता है । लगातार तीन दिन लेने से जमा हुआ कफ निकल कर फेफड़े साफ हो जाते है । महीने भर लेने से फेफड़े कर तपेदिक ठीक हो सकती है
  • दमे के उपचार के लिए तो आक एक रामबाण औषधि है। आक के पीले पड़े पत्ते लेकर चूना तथा नमक बराबर मात्रा में लेकर, पानी में घोलकर उसके पत्तों पर लेप करें। इन पत्तों को धूप में सुखाकर मिट्टी की हांड़ी में बंद करके उपलों की आग में रखकर भस्म बना लें। इस भस्म की दो−दो ग्राम मात्रा का दिन में दो बार सेवन करने से दमे में आश्चर्यजनक लाभ होता है। इस दवा के सेवन के साथ−साथ यह भी जरूरी है कि रोगी दही तथा खटाई का सेवन नहीं करे।
  • दमा के रोगियों में मदार के फूल एवं लौंग 10 से 20 ग्राम क़ी मात्रा में काली मिर्च के पाउडर 2.5 ग्राम की मात्रा के साथ अच्छी तरह पीसकर सुबह शाम 250 मिलीग्राम की मात्रा की एक एक गोली देने से भी लाभ मिलता है।

Homeopathy for Asthma

अस्थमा का होम्योपैथी में प्रभावशाली उपचार :-
होम्योपैथी सिर्फ अस्थमा लक्षणों का उपचार नहीं करती, यह अस्थमा को जड़ से ठीक करती है। शोधों ने यह दर्शाया है कि होम्योपैथिक दवाइयां महत्वपूर्ण रूप से हमारी श्वांस लेने की क्षमता, पूर्ण स्वास्थ्य में सुधार लाती है। यह शरीर की रक्षा को भी प्रेरित करती है।

१. अर्सेनिकम अलबम (अर्सेनिकम) : इस दवा का उपयोग सामान्य तौर पर एक एक्यूट अस्थमा के रोगी के लिए किया जाता है। इसका उपयोग आम तौर पर बैचेनी, भय, कमज़ोरी और आधी रात को या आधी रात के बाद इन लक्षणों का बढना, जैसे लक्षणों से पीडित मरीज़ों के लिए किया जाता है।
२.  हाऊस डस्ट माईट (हाऊस डस्ट माईट) : इस दवा का उपयोग अक्सर ऐसे मरीज़ो के लिए किया जाता है, जिन्हें घर में होनेवाली धूल से एलर्जी होती है। चूंकि लोगों में धूल की एलर्जी होना आम बात है, इस दवा को अस्थमा के एक गम्भीर दौरे के लिए एक महत्वपूर्ण उपचार माना जाता है।
३. स्पोंजिआ (रोस्टेड स्पंज) : यह दवा उन अस्थमा से पीडित लोगों के लिए उपयोग में लाई जाती है, जिनको बेहद कष्टदायी खांसी होती है, और छाती में बहुत कम या बिल्कुल भी कफ़ नहीं होता है। इस प्रकार का अस्थमा एक व्यक्ति को ठंड लगने के बाद शुरू होता है। इन मरीज़ो में अक्सर सूखी खांसी होती है।
४.  लोबेलिआ (भारतीय तंबाकू) : इस दवा का उपयोग उन अस्थमा से पीडित लोगों के लिए बेहद फायदेमन्द है, जिन्हें सांस की घरघराहट के साथ एक लाक्षणिक (टिपिकल) अस्थमा का दौरा पडता है। (इसमें छाती में दबाव का एक अहसास और सूखी खांसी भी शामिल है)
५. सेमबकस नाइग्रा (एल्डर) : इस दवा का उपयोग उन अस्थमा से पीडित लोगों के लिए बेहद फायदेमन्द है, जिन लोगों में सांस की घरघराहट की आवाज़ के साथ दम घुटने के लक्षण दिखाई देते हैं, खासकर यदि ये लक्षण आधी रात को या आधी रात के बाद, या लेटने के दौरान या जब मरीज़ ठंडी हवा के संपर्क में आते हैं, ऐसी स्थिति में अधिक बढते हैं।
६.  इपेकक्युआन्हा (इपेकाक रूट) : इस दवा का उपयोग उन अस्थमा से पीडित लोगों के लिए बेहद फायदेमन्द है, जिन लोगों की छाती में बहुत अधिक मात्रा में बलगम होता है।
७. एंटीमोनियम टेर्टारिकम (टार्टर एमेटिक) : इस दवा का उपयोग उन अस्थमा से पीडित बुजुर्गों और बच्चों के लिए बेहद फायदेमन्द है, जिनकी पूर्ण श्वसन-प्रश्वसन प्रक्रिया में शिथिलता या तेज़ी हो।

यह दवायें केवल उदहारण के तौर पर दी गयी है। कृपया किसी भी दवा का सेवन बिना परामर्श के ना करे, क्योकि होम्योपैथी में सभी व्यक्तियों की शारीरिक और मानसिक लक्षण के आधार पर अलग -अलग दवा होती है 


स्थमा से जुड़े भ्रम और तथ्य

दमा रोगियों के लिए धुंध और धूल भरा मौसम घातक हो सकता है। इसलिए ऐसे मौसम में दमा रोगी के लिए ज़रूरी हो जाती है आवश्‍यक देखभाल। इन सब बातों से भी ज्‍यादा ज़रूरी है, दमा रोग से संबंधी भ्रम और तथ्‍य पर नज़र डालना।
भ्रम : दमा एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज सम्भव है।
तथ्य: यह एक आजीवन और लम्बे समय तक रहने वाली बीमारी है। न हर्बल दवाओं से, मछली की दवाओं से या दूसरी दवाओं से अस्थमा का इलाज सम्भव है।
भ्रम : दमा के मरीज़ स्पोर्टस में भाग नहीं ले सकते।
तथ्य: अगर आपको दमा है तो ऐसे में आपको स्पोर्टस से दूर रहने की कोई ज़रूरत नहीं है ा स्पोर्टस में भाग लेने से आपकी अस्थमा की स्थिति ना ठीक होगी और ना ही बिगड़ेगी।
भ्रम : मेरे फेफड़े मजबूत हैं इसलिए मेरे अन्दर दमा से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता है।
तथ्य: यह बिलकुल ही गलत है। ऐसा कोई तथ्य अबतक सामने नहीं आया है कि दवाएं ना लेने से आपके फेफड़े मजबूत होंगे। दवाएं ना लेने से अस्थमा और भी खतरनाक हो सकता है और यहां तक कि इससे मृत्यु भी हो सकती है।
भ्रम : अस्थमा एक सार्जिकल बीमारी है।
तथ्य: यह बीमारी तब होती है जब हमारे फेफड़ों की आंतरिक दीवारें एलर्जिक प्रतियाओं के कारण म्यूकस के अत्यधिक अवोत किये जाने से होती है। यह कोई साजिकल या हार्मोनल बीमारी नहीं है।
भ्रम : अस्थमा की दवाओं में स्टेरायड होने की वजह से वो सुरक्षित नहीं होतीं।
तथ्य: अस्थमा की दवाओं में स्टेरायड की बहुत कम मात्रा इस्तेमाल की जाती है। यह एथलीट द्वारा अपनी पफर्दारमेंस को अच्छा करने की तुलना में बहुत कम होती है। यह स्टेरायड बिलकुल भी नुकसानदायक नहीं होते, इनकी मात्रा बस उतनी ही होती है जितनी की त्वचा पर लगाए जाने वाले क्रीम की होती है।
भ्रम : अस्थमा बस एक ही तरीके का होता है।
तथ्य: अस्थमा बहुत प्रकार का होता है और इसका प्रभाव अलग अलग लोगों में अलग अलग होता है ा अस्थमा का कोल्ड या सर्दी की तरह कोई खास लक्षण नहीं होता। इसका प्रभाव और लक्षण लोगों में अलग अलग होता है।
भ्रम : अगर बच्चे को लम्बे समय तक अस्थमा की दवाएं लेते हैं तो उनके बीमार होने पर अन्‍य दवाओं का प्रभाव कम हो जाता है।
तथ्य: अलग-अलग दवाओं का प्रभाव अलग होता है। कुछ दवाएं सिर्फ तभी काम करती हैं जब आपको बीमारी के लक्षणों से निजात पानी होती है और कुछ दवाएं प्रतिदिन लेनी पड़ती है। ऐसे में दवाएं लेने से पहले क्टरी सलाह ज़रूर लें।
भ्रम : अगर मैं अच्छा महसूस करता हूं तो इसका मतलब है कि मेरा अस्थमा ठीक हो गया है।
तथ्य: अगर आपको अस्थमा के लक्षण नहीं पता लग रहे तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपका, अस्थमा ठीक हो गया है।
भ्रम : बच्चों को अस्थमा की दवा देने का सबसे अच्छा तरीका है नेबुलाइज़र।
तथ्य: यह सही नहीं है, आज नेबुलाइज़र इनहेलर की जगह स्पेसर मास्क का प्रयोग किया जा रहा है जो कि इतने ही प्रभावी है।
क्या आप अस्थमा पेशेंट हैं तो यह करके भी देखें.

सांस की बीमारी (दमा या अस्थमा) एक आम रोग है। वर्तमान समय में अधिकांश लोग इससे पीडि़त हैं। आमतौर पर यह रोग अनुवांशिक होता है तो कुछ लोगों को मौसम के कारण हो जाता है। इसके कारण रोगी कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाते और जल्दी थक जाते हैं। मेडिकल साइंस द्वारा इस रोग का संपूर्ण उपचार संभव है। साथ ही यदि नीचे लिखे उपायों को भी किया जाए तो इस रोग में जल्दी आराम मिलता है। 



1- शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से लगातार तीन सोमवार तक एक सफेद रूमाल में मिश्री एवं चांदी का एक चौकोर टुकड़ा बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें तथा शिवजी को चावल के आटे का दीपक कपूर मिश्रित घी के साथ अर्पित करें। श्वास रोग दूर हो जाएंगे।



2- रविवार को एक बर्तन में जल भरकर उसमें चांदी की अंगूठी डालकर सोमवार को खाली पेट उस जल का सेवन करें। दमा रोग दूर हो जाएगा।



3- किसी भी मास के प्रथम सोमवार को विधि-विधानपूर्वक चमेली की जड़ को अभिमंत्रित करके सफेद रेशमी धागे में बांधकर गले में धारण करें और प्रत्येक सोमवार को बार-बार आइने में अपना चेहरा देंखे। सांस की सभी बीमारियां दूर हो जाएंगी।



4- सांस की नली में सूजन, सांस लेने में तकलीफ, फेफड़ों में सूजन के कारण कफ जमने अथवा खांसी से मुक्ति पाने के लिए किसी शुभ समय में केसर की स्याही और तुलसी की कलम द्वारा भोजपत्र पर चंद्र यंत्र का निर्माण करवाकर गले में धारण करें। श्वास संबंधी सभी रोग दूर हो जाएंगे।


5- रविवार के दिन सुबह छोटी दूधी लाकर, उसमें से 6 ग्राम और 3 ग्राम सफेद जीरा लेते हैं। दोनों को बारीक पीसकर पानी में घोलकर पी लेते हैं। इस दिन केवल दही में इच्छानुसार चिवड़ा भिगोंकर इच्छानुसार खाना चाहिए। अगले दिन सोमवार को दवा का सेवन न करें। मंगलवार को फिर उसी दवा का सेवन करें तथा दिन भर भोजन में दही चिवड़ा ही खाएं। इसके बाद अगले दिन यानी बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को दवा का सेवन न करें। फिर रविवार को दवा का सेवन करें तथा दिन भर भोजन में दही चिवड़ा ही खाएं इस प्रकार दवा का कोर्स पूरा करने पर पुराने से पुराना दमा नष्ट हो जाता है। विशेष सावधानी : रोगी को किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
Allopathic treatment of asthma:

अस्थमा का इलाज 2 तरह की दवाइयों रिलीवर व कंट्रोलर से हो सकता है। अस्थमा को कन्ट्रोल करने के लिए स्टेरॉयड सबसे फायदेमंद हैं। स्टेरॉयड जब इनहेलर रूप में लेते हैं तो इसका शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। इनहेलर दवा को फेफड़ों तक पहुंचाने का तरीका है। इनहेलर भी दो तरह के होते हैं। एक में लीवर की दवाई रहती है, दूसरे में कंट्रोलर दवाइयां होती हैं। कंट्रोलर इनहेलर नियमित तौर पर लेना होता है। लीवर इनहेलर अस्थमा के अटैक के समय काम आता है।

अस्थमा का मछली से इलाज
हैदराबाद में मछली के जरिए किया जाने वाला इलाज लोगों में काफी मशहूर है। ऐसी मान्यता है कि करीब 150 साल पहले वीरन्ना गौड़ नाम के एक व्यक्ति थे, जो दूसरों की हमेशा मदद किया करते थे। अचानक एक दिन उनसे एक दैवीय व्यक्ति मिले। प्रसन्न होकर उन्होंने इलाज का यह सीक्रेट फॉर्म्युला बताया और कहा कि इससे लोगों का मुफ्त इलाज करना। तब से लेकर आज तक बेथानी गौड़ परिवार इस फॉर्म्युला से लोगों का मुफ्त इलाज करता आ रहा हैं। हर साल मॉनसून की शुरूआत होते ही जून महीने में हैदराबाद की बेथियानी गौड़ फैमिली के पास दुनिया भर से हजारों लोग इस तरीके से अस्थमा का इलाज कराने आते हैं।
कैसे होता है इलाज
सबसे पहले बैथिनी मछली से बनी दवा को जिंदा मुरेल मछली के मुंह में रखा जाता है और उस मछली को मरीज के मुंह में डाल दिया जाता है। दो से सवा दो इंच लंबाई की यह मछली काफी चिकनी होती है, इसलिए मुह में आसानी से स्लिप हो जाती है और मरीज भी इसे आराम से निगल लेता है। शरीर के अंदर यह 15 मिनट तक जिंदा रहती है। यह मछली गले से लेकर पेट तक जाती है। उस दौरान उसकी पूंछ और पंख फड़फड़ाने से सांस लेने का पूरा सिस्टम साफ हो जाता है। बताते हैं कि अगर इस तरीके से तीन साल तक इलाज कराएं और 45 दिनों तक उनके अनुसार डाइट लेते रहें तो अस्थमा 100 फीसदी तक ठीक हो जाता है। यह दवा मृगशिरा कार्तिक नक्षत्र यानी जून के पहले सप्ताह के आस-पास दी जाती है।
आचार्य बालकृष्ण जी कुछ वीडियो:
१. शवास रोग-कफ अस्थमा रोगो में अमलतास का प्रयोग | आचार्य बालकृष्ण
२. श्वास रोग, अस्थमा व कफ (Asthma, Cough) में बहेड़ा का आयुर्वेदिक लाभ | Acharya Balkrishna
४. श्वास रोग, अस्थमा व कफ (Asthma, Cough) में अपामार्ग का आयुर्वेदिक लाभ | Acharya Balkrishna
८. श्वास रोग, अस्थमा व कफ (Asthma, Cough)में जौ का आयुर्वेदिक लाभ | Acharya Balkrishn
ध्यान रखें- दवाएं हमेशा डाक्टर की सलाह से लें। कई बार अधिक दवा लेना नुक्सानदायक भी हो सकता है।
यहाँ भी आपको अस्थमा के बारे में उपयोगी जानकारी मिल सकती है : ओन्‍ली माई हैल्‍थ