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गुरुवार, 13 जून 2013

होमियोपैथी और कुछ मिथ


होमियोपैथी को लेकर कई तरह के मिथ और गलत अवधारणाएं हैं। कई लोगों को तो होमियोपैथी पर अटूट विश्वास है, जबकि कई अन्य इसे कौड़ी का भाव नहीं देते। इसकी वजह होमियोपैथी से जुड़ी लोगों की गलतफहमी है, जबकि यह दुनिया भर में इलाज की एक जानी-मानी पद्धति है। इस पद्धति को लेकर लोगों की आम गलतफहमियां क्या हैं, और क्या है हकीकत, जानते हैं. होमियोपैथी दुनिया भर में जानी-मानी इलाज पद्धति है, लेकिन इसकी पॉपुलरिटी आज भी एलोपैथी की तुलना में काफी कम है। इसके कारणों में से प्रमुख है इस पैथी को लेकर प्रचलित कुछ मान्यताएं।

देर से असर करने वाली पैथी नहीं है होमियोपैथी
होमियोपैथी को लेकर जो सबसे आम धारणा है, वह यह कि यह बड़ी सुस्त रफ्तार से असर करता है और मरीज को काफी देर से राहत मिलती है। इस मान्यता के उलट, सच यह है कि अगर मरीज के केस का गहराई से अध्ययन कर सही ट्रीटमेंट किया जाए, तो होमियोपैथी तुरंत असरकारी साबित होता है। जब कोई गंभीर बीमारी हो, तो इलाज लंबे समय तक जारी रखना पड़ सकता है। अगर बीमारी काफी पुरानी है और बुरी तरह मरीज को चपेट में ले चुकी है, तो इलाज कई साल भी चल सकता है, क्योंकि हैमियोपैथी में मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखते हुए सावधानी से ट्रीटमेंट किया जाता है। 

पैथॉलजी से ज्यादा जोर साइन और सिम्पटम पर

लोग ऐसा मानते हैं कि होमियोपैथी से इलाज करने वाले डॉक्टर पैथॉलजी में विश्वास नहीं करते। इसीलिए वे मरीज की कोई पैथॉलजिकल जांच वगैरह नहीं करवाते। सच बात यह है कि किसी भी फिजिशियन के लिए सबसे पहले जरूरी है बीमारी को जानना। उसके बाद ही वह बीमारी के सिम्पटम्स, पैथॉलजी, कोर्स, कॉम्प्लिकेशन आदि के बारे में सही जानकारी ले सकता है। होमियोपैथी के तहत इलाज के दौरान मरीज की समस्याओं को उसके संपूर्ण व्यक्तित्व (सायकॉलजिकल व फिजिकल) के संदर्भ में देखा जाता है, न कि सिर्फ समस्याग्रस्त अंगों तक सीमित रहकर। 

स्टेरॉयड्स के प्रयोग की धारणा गलत

आम तौर पर माना जाता है कि होमियोपैथिक फिजिशियंस मरीज का इलाज करने के लिए स्टेरॉयड्स का इस्तेमाल करते हैं। अस्थमा, आर्थराइटिस आदि क्रॉनिक बीमारियों के इलाज को लेकर तो यह मान्यता लोगों में गहराई तक जड़ जमाई हुई है। लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसे मरीजों को पहले ही स्टेरॉयड्स दिए जा चुके होते हैं। होमियोपैथिक फिजिशियंस अपने पास ऐसे केस आने पर केस की डीटेल स्टडी करते हैं और मरीज के सिम्पटम्स व साइन समझने की कोशिश करते हैं। वे मरीज की हेरिडेटरी हिस्ट्री भी स्टडी करते हैं और यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि मरीज को अपने आसपास की किन चीजों से परेशानी होती है। तमाम बातों को समझते हुए उसके अनुकूल दवा दी जाती है। ऐसे में स्टेरॉयड्स का अनावश्यक और नियमित इस्तेमाल होमियोपैथी के सिद्धांतों के खिलाफ है और कोई भी एक्सपर्ट डॉक्टर ऐसा नहीं करता। 

रविवार, 9 जून 2013

तनाव से जुड़े भ्रम और तथ्य

 myths about stress
आइये आज हम जीवन में तनाव के बारे में जानते हैं।कामकाज के बोझ और व्यस्त रुटीन की इस जीवनशैली में तनाव की समस्या हमारे बीच बेहद आम है। अक्सर हम तनाव के बारे में जो धारणाएं पाल लेते हैं वे खुद कई बार हमारे लिए तनाव की स्थिति बन जाती हैं, जबकि उनका कोई वास्तविक आधार होता ही नहीं। जानिए, तनाव से जुड़ें ऐसे ही 5 मिथकों के बारे में।

मिथ 1- तनाव हमेशा बुरा ही होता है।
फैक्ट - तनाव हमेशा बुरा ही होता है यानी अगर आपको किसी भी बात का तनाव नहीं है तो आप बेहद खुश व स्वस्थ रहेंगे। असलियत यह है कि थोड़ा तनाव हमें मेहनत करने की प्रेरणा देता है। कई शोधों में यह सा‌बित हो चुका है कि जीवन में अगर तनाव न हो तो नीरसता भी जल्द घर करती है।

मिथ 2- हम नशे में भूल जाते हैं तनाव।
फैक्ट - अगर आप अपने दिन भर की थकान और तनाव से कुछ पल राहत पाने के लिए शराब का सहारा लेते हैं तो यह आपकी गलती होगी। डॉक्टरों का मानना है कि शराब के सेवन से शरीर में कार्टिजोल नामक हार्मोन बनता है जो तनाव बढ़ाता है। ऐसे में तनाव की स्थिति में शराब का सेवन फायदेमंद नहीं बल्कि और भी घातक है।

मिथ 3- अगर लक्षण नहीं दिख रहे तो स्ट्रेस का प्रभाव कम है।
फैक्ट - ऐसा जरूरी नहीं है। तनाव के जिन लक्षणों - अनिद्रा, वजन बढ़ने की बात हम करते हैं वे हमें तुरंत नहीं पता चलते हैं। कई बार तो स्ट्रोक या हार्ट अटैक के बाद हमें तनाव के इन लक्षणों का पता चल पाता है। ऐसे में अपना रुटीन चेकअप कराते रहें जिससे शरीर में होने वाले बदलावों और उनके कारणों की आपको पूरी जानकारी हो।

मिथ 4- अल्सर की वजह है तनाव।
फैक्ट - अक्सर लोग ऐसा मानते हैं कि अधिक तनाव वाले व्यक्ति को अल्सर होने की आशंका सबसे अधिक होती है जो गलत है।
अल्सर तनाव से नहीं होता बल्कि एक ऐसे बैक्टीरिया से होता है जो पेट और आंतों में जलन पैदा करता है। हो सकता है स्ट्रेस से पेट में गड़बड़ी हो लेकिन इसे अल्सर की वजह नहीं माना जा सकता है।

मिथ 5- तनाव के लक्षण सबके  लिए समान हैं।
फैक्ट - जिस तरह से तनाव के कई कारण हो सकते हैं, उसी तरह अलग-अलग लोगों में तनाव के अलग-अलग लक्षण दिखते हैं। तनाव को लेकर आपके शरीर की जो प्रतिक्रिया होती है, उसी आधार पर उसके लक्षण अलग-अलग होते हैं। मसलन, किसी को तनाव के दौरान चिढ़चिढ़ापन अधिक होता या नींद नहीं आती है तो किसी को अधिक नींद आती है या पेट खराब हो सकता है।


(ब्लॉग जगत से बीते दिनों दूर रहने के कारण मुझे भी तनाव हो गया था,कामकाजी जगहों पर तनाव का असर दूरगामी होता है. इससे उस व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसके कामकाज पर प्रतिकूल असर पड़ता है.आशा है यह आलेख आपके लिए लाभप्रद होगा)